Friday, 11 May 2012

सर्वज्ञ है गूगल


किस बात की है परदेदारी

 
    ऐसी छुिट्टयां, तौबा, तौबा.. और वह भी ट्विटर के चलते। लेघ व एमिली ने यह तो कतई न सोचा होगा। अमेरिका घूमने निकले दो ब्रिटिश दोस्तों पर एक ट्विट के चक्कर में न केवल अमेरिका में घुसने पर पाबंदी लगा दी गई, बल्कि उनसे आतंकवादियों सरीखा व्यवहार हुआ, पांच घंटे तक सख्त पूछताछ हुई और रात उन्हें खूंखार अपराधियों के साथ लॉक-अप में गुजारनी पड़ी। अमेरिकी पुलिस का मानना था कि लेघ व उसकी 24 साल की साथी एमिली अमेरिका में अपराध करने के इरादे से आए हैं। यह सब केवल इसलिए कि 26 साल के लेघ वान ब्रायन ने छुट्टी  में अमेरिका जाने से कई दिन पहले अपने दोस्तों को यह ट्विट किया था कि- अमेरिका जाकर उसे नष्ट करने से पहले इस हफ्ते मैं थोड़ी गप्पबाजी के लिए फुर्सत में हूं। लेघ भले ही कहते रहें कि उनके लिए इसका आशय अमेरिका जाकर मस्ती करने से था और इस लफ्ज का इस्तेमाल ब्रिटेन में इसी अर्थ में किया जाता है, लेकिन उनकी किसी ने न सुनी। 
 
  जरा कल्पना कीजिए। ब्रिटेन का युवक, छुट्टी पर जाने से तीन हफ्ते पहले अपने दोस्तों को ट्विट करता है और अमेरिका पहुंचते ही वह ट्विट उसके लिए जिंदगी की सबसे बड़ी मुसीबत बन जाता है। उसे अंदाजा भी न होगा कि यह निरापद सा ट्विट कहीं और, कोई और पढ़कर उसके लिए जाल बुन रहा होगा। 
 
  इंटरनेट पर आपकी निजता में इस तरह के कई सेंध लग रहे हैं। आप इंटरनेट पर क्या कर रहे हैं, यह तो पता लगा ही लिया जाता है, आप कहां हैं- यह भी पकड़ में आ रहा है। और तो और, आपके मन को भी पढ़ने की कोशिश की जा रही है। जाहिर है कि मसला केवल अपने निजी के पब्लिक होने के खतरे का ही नहीं हैं। खतरा तब और भी ज्यादा है जब आपके इस निजी का मतलब वो लोग अपनी मर्जी से निकालें जिनकी निगाहों से सब गुजर रहा है। आप लाख सोचते रहें कि आपके फेसबुक और ट्विटर अकाउंट आपकी असीमित दुनिया हैं जो आपको अपने लिए स्पेस व आजादी का अहसास देती है, लेकिन यह सारी आजादी वहीं तक सीमित है, जब तक कोई उसपर अपनी कुदृष्टि न डाल दे। 
 
  इंटरनेट की यह दुनिया अपरंपार है और इस पर लगी निगाहें भी न जानें कितनी हैं। इंटरनेट पर आपका हर कदम आपके खाते में हिसाब की तरह दर्ज हो रहा है। आपको इस हिसाब के बारे में कुछ पता नहीं, लेकिन आपका हिसाब कइयों को पता है। जाहिर है, निजता की यही लूट इंटरनेट जगत में इन दिनों उथल-पुथल मचाए हुए है। खास तौर पर इंटरनेट जगत के सबसे बड़े खोजी जासूस गूगल की नई प्राइवेसी नीतियों की वजह से, जो पहली मार्च से लागू हो रही हैं। 
 
  इलेक्ट्रॉनिक फ्रंटियर फाउंडेशन के केविन बैंकस्टन ने कुछ दिनों पहले कहा था कि गूगल आपके बारे में आपकी मां से भी ज्यादा जानता है। गूगल की साठ से ज्यादा साइट हैं। इनमें से किसी भी साइट पर अगर आप अपने बारे में कोई भी जानकारी, फोटो वगैरह डालें तो नई नीतियों के अनुसार उस सारी जानकारी का इस्तेमाल गूगल समूह की सारी साइट अपने हिसाब से कर सकती हैं, अपने धंधे व मुनाफे के लिए कर सकती है। गूगल की हर किस्म की इन साठ साइटों के पास किसी व्यक्ति के बारे में कितनी जानकारी जमा हो जाती है, उसका अंदाजा बैंकस्टन के इस कथन से भी लगाया जा सकता है- गूगल चाहता है कि आप उसपर इतना भरोसा करें कि अपने दिमाग का मानो प्रिंटआउट ही उसे सौंप दें। 
 
  यहां बात गूगल की इसलिए हो जा रही है क्योंकि इंटरनेट जगत में उसका जाल लगातार बड़ा हो रहा है। लेकिन खतरा तो उनसे भी है जो गूगल तो नहीं हैं, फेसबुक या ट्विटर भी नहीं है लेकिन आपके बारे में सब कुछ जानना चाहते हैं। इसमें उनके स्वार्थ भी छुपे हैं और कुछ अनजाने डर भी। ब्रिटेन के लेघ ब्रायन व एमिली के मामले में ऐसा ही हुआ। वरना, लेघ की ट्विट कुछ इसी तरह की थी जैसे कि मैं कहूं कि इस बार अमेरिका जाकर मैं सबका बैंड बजा दूंगा.. या लास वेगास जाकर मैं अमेरिका की वॉट लगा दूंगा .. 
 
खुला है हर खत 
 
   प्राइवेसी का मसला वहा ज्यादा खड़ा होता है जहा आपकी वह बात बेपरदा हो जाती है जो आप मानकर चलते हैं कि केवल उसे पता है, जिसे आप बता रहे हैं। ईमेल भी उन्हीं में से एक है। मेरे एक परिचित ने अपने एक घनिष्ठ मित्र को मेल लिखा और उसमें उसने यह उल्लेख किया कि वह काफी डिप्रेशन में है। वह हैरान रह गया जब कुछ समय बाद उसे अनजान लोगों से ऐसे मेल आने लगे जो उसे डिप्रेशन से मुक्त होने व काउंसलिंग के तरीके सुझाने लगे। ऐसे ही एक अन्य मित्र ने मुझे मेल में कुछ धन के संकट से गुजरने की बात लिखी थी। संयोगवश उन्हीं दिनों उस मित्र ने क्रेडिट कार्ड के लिए आवेदन किया हुआ था। जिस क्रेडिट कार्ड कंपनी के नुमाइंदे महीने भर से क्रेडिट कार्ड खुलवाने के लिए उसके पीछे पड़े हुए थे, उस मेल के बाद उसी कंपनी ने दो दिन के भीतर उसका आवेदन खारिज कर दिया जबकि उसने किसी और से इस बारे में कभी कुछ नहीं कहा था। इतना ही नहीं, आजकल प्रेम संबंधों में जासूसी के लिए ईमेल स्क्रीनिंग व हैकिंग का खासा इस्तेमाल किया जाने लगा है। लोगों को अपने इस ऑनलाइन प्राइवेट स्पेस को लेकर खतरा लगने लगा है। 
 
जिन खोजा तिन पाइया 
 
मैंने कुछ दिन पहले एक ट्विट किया जिसमें किसी राजनीतिक घटना पर मन को तकलीफ होने की बात कही थी। पलक झपकते मेरे पास दूर देशों से उन लोगों के जवाब आने लगे जिनसे मेरा दूर-दूर का कोई वास्ता न था, यह सुझाते हुए कि मैं सिरदर्द व कमरदर्द की तकलीफ कम करने के लिए क्या कर सकता हूं। यह कोई मजाक नहीं, इंटरनेट मार्केटिंग का सच है। ट्विटर व फेसबुक पर इस तरह की मार्केटिंग आसान है क्योंकि यहा आप जो लिख रहे हैं वो कोई भी ढूंढ सकता है। 
 
सब दर्ज है सर्वर में 
 
यह तो अब आम जानकारी है कि इस ऑनलाइन जगत में इंटरनेट कनेक्शन वाले हर कंप्यूटर का अपना एक अलग पता होता है जो उसकी विशिष्ट पहचान होती है। उस पते की मदद से उस कंप्यूटर को आसानी से खोजा जा सकता है। लेकिन यह तो बात हुई केवल कनेक्शन की। वेब तकनीक में लगातार हो रही उन्नति ने आपकी इस पहचान को इससे कहीं ज्यादा उजागर कर दिया है। आप कौन हैं, किस जगह से हैं, किस उम्र के हैं, क्या करते हैं, कितना कमाते हैं, क्या शौक रखते हैं, क्या पसंद करते हैं, क्या खाते हैं, कहा घूमते हैं, आपके दोस्त कौन हैं और आप किन से दोस्ती करना चाहते हैं- कुछ भी ऐसा नहीं जो आपके बारे में पता न हो।
  मजे की बात यह है कि आपके बारे में यह सब आपके जाने बगैर पता चल जा रहा है। आपकी नेटवर्किंग साइट्स, आपके मेल अकाउंट, और यहा तक की आपकी नेट सर्फिंग भी सारे रहस्य खोल देती है। आप जीमेल पर लॉग इन होने के बाद गूगल पर कुछ भी सर्च करें तो उसे गूगल के सर्वर दर्ज कर लेंगे। गूगल के नेट ब्राउजर क्रोम पर तो यह भी आपके खाते में दर्ज हो जाएगा कि आप कौन-कौन सी साइट देख रहे हैं। इंटरनेट की दुनिया के अंतर्संबंध आपके बारे में सब कुछ उजागर कर देते हैं। बात स्क्रीनिंग से भी आगे बढ़ चुकी है। दो बानगी देखिए
 
1. दो साल पहले एमआईटी के एक क्लासरूम प्रोजेक्ट में कार्टर जर्निगन और बेहराम मिस्त्री ने छात्रों के चार हजार फेसबुक प्रोफाइल का अध्ययन करके 78 फीसदी मामलों में यह सही-सही पता लगा लिया कि उक्त प्रोफाइल किसी समलैंगिक पुरुष का है।
2. स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी के अरविंद नारायण और टेक्सास यूनिवर्सिटी के विताली श्मातिकोव ने ट्विटर व फोटो शेयरिंग साइट फ्लिकर के कई अकाउंट की छानबीन करके तीस फीसदी मामलों में उनके धारकों की सही पहचान कर ली जबकि उनके पास उन अकाउंट की पहचान वाली कोई चीज, जैसे कि नाम या ईमेल आईडी वगैरह नहीं थे। 
 
    हम रास्ते चलते किसी अनजान को अपना पता और अपने बारे में सारी जानकारी नहीं दे देते लेकिन इंटरनेट व नेटवर्किग साइट्स पर तो हम सारी जानकारी अनजान लोगों के देखने या इस्तेमाल करने के लिए डाल देते हैं। हर चीज- हमने क्या खाया, कहा गए, कौन सी फिल्म देखी, कैसी लगी, वगैरह-वगैरह। कंप्यूटर वैज्ञानिक कहते हैं कि खुद को बया करने की यह फितरत आज के दौर में ऐसी हो गई है कि इस सारी जानकारी को इकट्ठा करके व्यक्ति के बारे में सारी जानकारी आसानी से हासिल की जा सकती है। अमेरिका के फेडरल ट्रेड कमीशन के प्राइवेसी डिवीजन की एसोसिएट डाइरेक्टर रही मनीषा मित्ताल कहती हैं कि तकनीक ने व्यक्ति की पहचान के पारंपरिक पैमानों को बेकार बना दिया है। अमेरिका की कार्नेगी मेलन यूनिवर्सिटी के दो शोधकर्ताओं ने कुछ समय पहले कहा था कि वे 1989 से 2003 के बीच अमेरिका में पैदा हुए लोगों में से 8.5 फीसदी यानी पचास लाख लोगों के नौ अंकों के सामाजिक सुरक्षा नंबर को बिलकुल सही अनुमान लगा सकते हैं। कल्पना कीजिए कि अमेरिका में लोगों की पहचान का यह सबसे बड़ा जरिया है, जिसे हासिल करने के लिए फर्जी लोग हर मुमकिन कोशिश करते रहते हैं। 
 
सर्वज्ञ है गूगल 
 
जानें कि गूगल क्या-क्या जानता है आपके बारे में
1. अपने सर्च इंजन के जरिये आप क्या खोज रहे हैं?
2. आप किन वेब पन्नों पर जाते हैं?
3. आप किन ब्लॉग्स को पढ़ते हैं?
4. गूगल एडसेंस या चेकआउट के जरिये आपकी वित्ताीय स्थिति।
5. आपकी वेबसाइट या ब्लॉग की लोकप्रियता।
6. जीमेल का इस्तेमाल करने वालों के मामले में वे किसे और क्या ईमेल कर रहे हैं?
7. आपके पूरे कंप्यूटर में क्या-क्या है, अगर आप गूगल डेस्कटॉप का इस्तेमाल कर रहे हैं?
8. जो गूगल डॉक या स्प्रेडशीट का इस्तेमाल करते हैं, उनके मामले में उनके रिसर्च पेपर, बिल या आगामी ब्लॉग पोस्ट तक।
9. गूगल कैलेंडर का इस्तेमाल करते हैं तो आपका पूरा कार्यक्रम।
10. आपका सोशल नेटवर्क और रुचिया।
11. गूगल लैटिट्यूड व गूगल मैप इस्तेमाल करने वालों के मामले में यह कि वे या उनके दोस्त ठीक कहा पर हैं?
12. आप यू ट्यूब पर क्या देख रहे हैं?
13. गूगल बुक्स और स्कूल व यूनिवर्सिटी सर्च के जरिए आप क्या पढ़ रहे हैं?
14. अगर आप गूगल क्रोम का इस्तेमाल कर रहे हैं तो इंटरनेट पर आपकी हर गतिविधि।
15. गूगल आनसर्स का इस्तेमाल कर रहे हैं तो आपकी हर समस्या।
16. गूगल हेल्थ का इस्तेमाल कर रहे हैं तो आपका पूरा मेडिकल इतिहास।
17. गूगल मैप्स, एडसेंस व चेकआउट का इस्तेमाल कर रहे हैं तो आपके घर का पता।
18. गूगल मोबाइल या जीमेल के जरिये आपका मोबाइल नंबर।
19. गूगल टॉक का इस्तेमाल कर रहे हैं तो आपकी आवाज कैसी है?
20. फोटो एडिटर पिकासा का इस्तेमाल कर रहे हैं तो यह कि आप, आपके घर वाले और दोस्त कैसे दिखते हैं?
21. गूगल अलर्ट के जरिये यह कि आपके लिए क्या जरूरी है?
22. एडवर्ड्स पर कीवर्ड व खरीद के व्यवहार के जरिये यह कि आपका धंधा क्या है?
23. प्रोडक्ट्स सर्च व कैटालॉग सर्च के जरिये यह कि आपने क्या-क्या खरीदा है और क्या खरीदने वाले हैं
 ( लेख - उपेंद्र स्वामी )
 

Tuesday, 17 April 2012

अजब देश की गज़ब कहानी


बिना परीक्षा के 'डाक्टर' का सुझाव नामंज़ूर


यूनिवर्सिटी

  
मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया ने लखनऊ के छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय के उस सुझाव को नामंजूर कर दिया है जिसमें लगातार फ़ेल हो रहे छात्रों को बिना इम्तिहान के डिग्री (एम बी बी एस) देने की सिफ़ारिश की गई थी.

विश्वविद्यालय ने ये सिफ़ारिश भी की थी कि भविष्य में इम्तिहान में बैठने के लिए एक निश्चित समयावधि तय कर दी जाए
 
मेडिकल काउंसिल की सचिव डा. संगीता शर्मा ने कुलपति को भेजे एक पत्र में कहा है कि बोर्ड ऑफ गवर्नर्स ने अपनी बैठक में नियमों को शिथिल करने के सुझाव पर विचार करने के बाद फैसला किया है कि वर्तमान नियम को लागू रखा जाए.

वर्तमान नियमों में  मेडिकल की परीक्षा में पास होने के लिए थ्योरी और प्रैक्टिकल में न्यूनतम 50  फ़ीसदी नंबर लाना ज़रूरी है.

न केवल लखनऊ बल्कि भारत के अन्य मेडिकल कालेजों में भी बहुत से छात्र ऐसे हैं जो दस-पन्द्रह सालों में भी एम बी बी एस का इम्तिहान नहीं पास कर पाए हैं.

इनमे से अधिकांश छात्र रिज़र्व श्रेणी के हैं, जिन्हें कम अंकों के आधार पर दाख़िला मिलता है.

सालों से फेल हो रहे है

 

लखनऊ के मशहूर किंग जार्ज मेडिकल कॉलेज या छत्रपति शाहूजी महराज मेडिकल यूनिवर्सिटी में इस समय क़रीब 50 ऐसे छात्र हैं जो सालों से एम बी बी एस का इम्तिहान पास नहीं कर पाए हैं. सबसे पुराना छात्र 1985 बैच का है.

विश्वविद्यालय के अधिकारियों के अनुसार इनमें तीन चौथाई से ज्यादा छात्र अनुसूचित जातियों के है.

विश्वविद्यालय ने ऐसे छात्रों के लिए अलग से क्लासेस चलवाईं, फीस माफ़ की, किताबें दीं लेकिन ये फ़िर भी परीक्षा पास नही कर पाए.

कुलपति प्रोफ़ेसर डी के गुप्ता ने हाल में ही मेडिकल की शिक्षा की देख-रेख करने वाली संस्था मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया को पत्र लिखकर सुझाव दिया था कि अभी तक जो पांच नंबर का ग्रेस मार्क केवल एक विषय में दिया जाता है उसे दो या अधिक विषयों में वितरित करके फ़ेल हो रहें छात्रों को पास करने में मदद की जाए.

दूसरा सुझाव यह था कि चूंकि आरक्षित छात्रों को न्यूनतम 40 फीसदी नंबर पर दाख़िला मिलता है तो इनका पास प्रतिशत भी घटाकर 40 कर दिया जाना चाहिए.

कई सालों से फ़ेल हो रहें छात्रों के बारे में कुलपति ने सुझाव दिया था कि इस ग्रुप को अब बिना और कोई इम्तिहान दिए डिग्री देने पर विचार किया जाना चाहिए.

उन्होंने ये भी कहा था कि भविष्य के लिए काउंसिल पुराने नियम को बहाल करते हुए परीक्षा पास करने के लिए अधिकतम समयावधि तय कर दे.

समय सीमा का सुझाव

 

उन्होंने सुझाव दिया कि साढ़े चार साल का एम बी बी एस कोर्स पास करने के लिए किसी भी छात्र को अधिकतम नौ साल का समय दिया जाए जिसमें एक प्रोफेशनल साल के इम्तिहान को पास करने के लिए अधिकतम तीन मौक़े मिलने चाहिंए

दरअसल पहले इस मामले में जो नियम लागू था वो इसी आधार पर था लेकिन साल 1997 में मेडिकल काउंसिल ने इसे ख़त्म करके मेडिकल छात्रों को बिना किसी मियाद तक पढ़ने और इम्तिहान पास करने की सुविधा दे दी थी.

लेकिन मेडिकल काउंसिल ने पुरानी व्यवस्था बहाल करने, पास प्रतिशत कम करने या पुराने फ़ेल छात्रों को यूं ही पास किए जाने का सुझाव फिलहाल नामंज़ूर कर दिया है.

इससे पहले इन छात्रों की तरफ से अनुसूचित जाति आयोग में शिकायत की गई थी कि वे आरक्षित वर्ग के हैं इसलिए परिक्षक जानबूझकर उन्हें कम नंबर देते हैं.

हालांकि सुनवाई के बाद कमीशन ने यह शिकायत ख़ारिज कर दी थी.

शिकायत के मद्देनज़र यूनिवर्सिटी ने कापियों की बार कोडिंग कर दी थी ताकि परीक्षकों को छात्र की पहचान न हो सके यानि उन्हें ये पता न चल पाए कि कापी किस छात्र की है.

पक्षपात का आरोप

 

चूंकि स्थानीय प्रोफेसर्स पर पक्षपात का आरोप था इसलिए यूनिवर्सिटी ने बाहर के परीक्षक बुलवाए. मगर नतीजा नहीं बदला. ये छात्र पास होने के लिए ज़रूरी पचास फ़ीसदी नंबर नही ला पाए.

विश्वविद्यालय के अधिकारियों के अनुसार छात्रों को यह प्रस्ताव भी दिया गया कि वे परीक्षकों के नाम स्वयं बता दें, जो उत्तर पुस्तिकाओं में लिखी गई सामग्री के आधार पर कापी जांच कर उनको नंबर दे सकें.

हाईकोर्ट का आदेश है कि अगर परीक्षक उत्तर पुस्तिका में लिखी गई बातों को नजरअंदाज कर नंबर देते हैं तो उन्हें जुर्माना हो सकता है. इसलिए कोई परीक्षक उदारता करते हुए ज्यादा नंबर नहीं दे सकता है.

हार मानकर यूनिवर्सिटी ने मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया को मशविरा दिया था कि इनके लिए पास का परसेंटेज कम करने के अलावा परीक्षा पद्धति में कुछ और बदलाव किये जाने चाहिए.

प्रोफ़ेसर गुप्ता का कहना है कि यह एक मानवीय समस्या है और वह उसका समाधान करना चाहते हैं.

शिक्षकों का कहना है कि इलाहाबाद, झांसी, मेरठ और देश के दूसरे मेडिकल कालेजों में भी यह समस्या है लेकिन कोई इसका हल ढूंढने की कोशिश नहीं कर रहा.
रामदत्त त्रिपाठीरामदत्त त्रिपाठी ,बीबीसी संवाददाता, लखनऊ, शुक्रवार, 9 दिसंबर, 2011 को 23:35 IST तक के समाचार